बुधवार, 20 मई 2009

राजू- ''पापा'' आप कैसे कह सकते हैं कि ये पुरानी फिल्‍म है।पापा- ''बेटा'' हीरों-हीरोईन कपड़े जो पहने हैं।

सिनेमा में बढ़ती अश्‍लीलता के जिम्‍मेंदार फिल्‍म निर्माता हैं या प्रशासन अथवा प्रजा अर्थात हम।मेरे विचार से सबसे अधिक जिम्‍मेंदार प्रजा अर्थात हम हैं। अगर हम प्रोत्‍साहन न देते तो यह सब सम्‍भव ही न हो पाता। पुरानी फिल्‍में जैसे-आनन्‍द, शहीद, आनन्‍दमठ, क्रान्‍ती इत्‍यादि इन फिल्‍मों की कहानी में कुछ तथ्‍य होता था। दिलीप कुमार, मनोज कुमार के अभिनय और आजकल के इन छोकरों की मारधाड़ एवं फूहड़ सैक्‍सी हरकतों का तुलनात्‍मक अध्‍ययन करना, हीरे-कांच की तुलना करने के सदृश्‍य ही साबित होगी।कुछ अच्‍छे प्रयास जैसे मुन्‍नाभाई और चक दे इंडिया सामने आते हैं तो इनमें भी फूहड़ता दिखना फिल्‍म निर्माता नहीं भूलते। मुन्‍नाभाई में कैरम खिलाने तक तो बात सीमा के अन्‍दर है परन्‍तु आंखो में आंखे डाल के झूम ले जैसा गाना इस फिल्‍म को परिवार के साथ बैठकर देखने के नालायक बनाता है। चक दे इंडिया में चंडीगढ़-कप्‍तान के मंगेतर का टीम के रहने के स्‍थान पर आकर अपनी होने वाली बीवी के साथ रात बिताना अनुशासन-मर्यादा के विरूद्ध है। शायद फिल्‍म निर्माता यह सोचते है कि ऐसे दृश्‍यों को दर्शाये बिना फिल्‍म सफल ही नहीं हो सकती!मेरे विचार से सैंसर बोर्ड का नाम नानसैन्‍स-बोर्ड उपयुक्‍त रहेगा। प्रशासन रूपी दुशासन तो सदा हमारी भारतीय संस्‍कृति के चीरहरण के लिए सदस तत्‍पर ही है। अभी आपने सुना होगा रामसेतु के मामले में सरकार का कहना-कि राम रावण युद्ध कभी हुआ ही नहीं और रामायण में संशोधन की आवश्‍यकता है। क्‍या है कोई इस देश का शुभचिंतक जो हमारे भविष्‍य को सुधारने का प्रयास करे!

6 टिप्‍पणियां:

सागर नाहर ने कहा…

बढ़िया विषय पर पोस्ट लिखी आपने, थोड़ी सी असहमति भी है। मैं अभी फिल्म के नाम याद नहीं कर पा रहा हूं पर ऐसा नहीं है कि अच्छी और पारिवारिक फिल्में बिल्कुल नहीं बनती।
हां उनकी संख्या इतनी कम होती है कि गिनती करना या उदाहरण दे पाना भी मुश्किल है।
॥दस्तक॥,
गीतों की महफिल,
तकनीकी दस्तक

Unknown ने कहा…

चीज़ों को समझने की कोशिश नहीं करेंगे तो ऐसे ही सामान्यीकृत व्याख्याओं में उलझे रहेंगे...

सुस्वागतम्....

Neeraj Kumar ने कहा…

Yah koi itni pareshani ki baat nahi hai...jo aap chintit hain...samay badal raha hai aur ham apne bachpan ko yaad karte hain aur chahten hai ki samaj ek hi jagah ruka rahe jo sambhav nahi hai...Cinema ko dosh kyo den jab samaj badal chuka hai...aaj hi newspaper men nikla hai ki Supreme Court ne kaha hai ki 18 varsh se jyada age ki girls kisi ke saath evam kisi bhi jagah rahne ke liye swatantr hai... Isse Live-in relations ko badhava milega...
Kya kahten hain...

Meher Nutrition ने कहा…

This is due to the innate deisre of human being that forces the produces and directors to present such material. Although it is expected of sensor board to be strict but agian desire of office holders forces them not to do so.
Avatar Meher Baba has given a very good Mantra "Desire for Desirelessness".This mantra willnot ony solve aall teh worldly problems but will also offer spiritual heights. A good post, congratulations to you and best wishes.
Lots of Love
Chandar Meher
Avatar Meher Baba Ji Ki Jai

Sanjay Grover ने कहा…

हुज़ूर आपका भी .......एहतिराम करता चलूं .....
इधर से गुज़रा था- सोचा- सलाम करता चलूं ऽऽऽऽऽऽऽऽ

कृपया एक अत्यंत-आवश्यक समसामयिक व्यंग्य को पूरा करने में मेरी मदद करें। मेरा पता है:-
www.samwaadghar.blogspot.com
शुभकामनाओं सहित
संजय ग्रोवर

उम्मीद ने कहा…

आप की रचना प्रशंसा के योग्य है . लिखते रहिये
चिटठा जगत मैं आप का स्वागत है

गार्गी