राजू- ''पापा'' आप कैसे कह सकते हैं कि ये पुरानी फिल्म है।पापा- ''बेटा'' हीरों-हीरोईन कपड़े जो पहने हैं।
सिनेमा में बढ़ती अश्लीलता के जिम्मेंदार फिल्म निर्माता हैं या प्रशासन अथवा प्रजा अर्थात हम।मेरे विचार से सबसे अधिक जिम्मेंदार प्रजा अर्थात हम हैं। अगर हम प्रोत्साहन न देते तो यह सब सम्भव ही न हो पाता। पुरानी फिल्में जैसे-आनन्द, शहीद, आनन्दमठ, क्रान्ती इत्यादि इन फिल्मों की कहानी में कुछ तथ्य होता था। दिलीप कुमार, मनोज कुमार के अभिनय और आजकल के इन छोकरों की मारधाड़ एवं फूहड़ सैक्सी हरकतों का तुलनात्मक अध्ययन करना, हीरे-कांच की तुलना करने के सदृश्य ही साबित होगी।कुछ अच्छे प्रयास जैसे मुन्नाभाई और चक दे इंडिया सामने आते हैं तो इनमें भी फूहड़ता दिखना फिल्म निर्माता नहीं भूलते। मुन्नाभाई में कैरम खिलाने तक तो बात सीमा के अन्दर है परन्तु आंखो में आंखे डाल के झूम ले जैसा गाना इस फिल्म को परिवार के साथ बैठकर देखने के नालायक बनाता है। चक दे इंडिया में चंडीगढ़-कप्तान के मंगेतर का टीम के रहने के स्थान पर आकर अपनी होने वाली बीवी के साथ रात बिताना अनुशासन-मर्यादा के विरूद्ध है। शायद फिल्म निर्माता यह सोचते है कि ऐसे दृश्यों को दर्शाये बिना फिल्म सफल ही नहीं हो सकती!मेरे विचार से सैंसर बोर्ड का नाम नानसैन्स-बोर्ड उपयुक्त रहेगा। प्रशासन रूपी दुशासन तो सदा हमारी भारतीय संस्कृति के चीरहरण के लिए सदस तत्पर ही है। अभी आपने सुना होगा रामसेतु के मामले में सरकार का कहना-कि राम रावण युद्ध कभी हुआ ही नहीं और रामायण में संशोधन की आवश्यकता है। क्या है कोई इस देश का शुभचिंतक जो हमारे भविष्य को सुधारने का प्रयास करे!